अध्याय 4.
स्वदेशी
-बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन"
मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान ।
मुसल्मान, हिंदू
किधौं, के हैं ये क्रिस्तान ।।2।।
मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान ।
मुसल्मान, हिंदू
किधौं, के हैं ये क्रिस्तान ।।2।।

पद-परिचय—इस सवैये में प्रेम के मार्ग को सरल बताते हुए कहा है कि इसमें कोई खर्च नहीं लेकिन सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है।
भावार्थ—प्रेम का मार्ग अत्यन्त सरल मार्ग है । जिस मार्ग में चतुराई का टेढी चाल की कोई जगह नहीं है। इस मार्ग में सच्चाई का भी अभिमान ठिठक जाता है । इसमें कपटी लोग अपना स्थान नहीं बना पाते हैं। घनानन्द का कहना है कि हे प्यारे सज्जन, इस मार्ग के समान दूसरा कोई मार्ग नहीं है। इस मार्ग का अनुकरण करने वाले का कोई खर्च नहीं लेकिन प्राप्ति सब कुछ हो जाती है l
प्रश्न - कवि कहाँ अपने आँसुओं को पहुंचाना चाहते हैं और क्यों ?
उत्तर कवि अपने आँसुओं को सज्जन लोगों के आँगन तक पहुँचाना चाहता है क्योंकि सज्जन जन ही कवि को पीड़ा का अनुभव कर सकते हैं, कोई दुष्ट नहीं। इसीलिए कवि की आकांक्षा है कि मेरी पीड़ा सज्जन के आंगन तक पहुँचाकर परोपकारी मेघ मेरी पीड़ा को कम करने में मदद देगा।
प्रश्न - कवि प्रेम मार्ग को "अति सूघो" क्यों कहता है ? इस मार्ग की विशेषता क्या है ?
उत्तर-कवि प्रेम मार्ग को अति सूधो (अत्यन्त शुद्ध सरल) इसलिए कहा है क्योंकि इस मार्ग पर चलकर मनुष्य बिना खर्च किये हुए सब कुछ पा सकता है। इस मार्ग की विशेषता है कि इस मार्ग में सत्य का भी स्वाभिमान समाप्त हो जाता है तथा चतुराई का भी इस मार्ग में कोई स्थान नहीं रहता है।
सरलार्थ-जो मनुष्य अपने दुःखी नहीं होता है। सुख-स्नेह और भय भी जिसको प्रभावित नहीं करता है, जो दूसरे के धन को माटी मानता है, जिसे निन्दा, प्रशंसा, लोभ, मोह और अभिमान प्रभावित नहीं करता है जिसको हर्ष या शोक प्रभावित नहीं करता है, जो मान अपमान नहीं समझता है, जो मन से आशा, तृष्णा आदि सब कुछ त्यागकर देता है तथा जो सांसारिक माया से मुक्त रहता है जिसको काम, क्रोध आदि स्पर्श भी नहीं करता है। ऐसे व्यक्ति के ही हृदय में ईश्वर का निवास होता है। जिस व्यक्ति पर गुरु की कृपा हो जाती है वही व्यक्ति इस रहस्य को जान सकता है। गुरु नानक कहते हैं कि ईश्वर भक्ति में इस प्रकार लीन हो जाओ जैसे नदी का पानी समुद्र के पानी में मिलकर लीन हो जाता है।
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