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बुधवार, 9 दिसंबर 2020

अध्याय 4. स्वदेशी -बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन" (गोधूलि 10)

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अध्याय 4.

स्वदेशी

                     -बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन"


शब्द निधि : 
गति स्वभाव । रति = लगाव । रीति = पद्धति । मनुज भारती = भारतीय मनुष्य । क्रिस्तान क्रिश्चियन, अंग्रेज । बसन = वस्त्र । बानक = बाना, वेशभूषा । खामखयाली चारहु बरन = चारों वर्णों में । डफाली = डफ बजानेवाला, बाजार बजाने वाला । कोरी कल्पना ।

सबै बिदेसी वस्तु नर, गति रति रीत लखात । 
भारतीयता कछु न अब, भारत में दरसात ।। 1।।
अर्थ -भारत में भारतीयता नाम की कुछ नहीं बचा है। यहाँ के लोगों के स्वभाव, रीति-रिवाज सभी पक्षों में विदेशी वस्तुओं से लगाव हो गया है। 

मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान ।

मुसल्मान, हिंदू किधौं, के हैं ये क्रिस्तान ।।2।।

अर्थ-देखकर कोई पहचान नहीं कर सकता है कि यह आदमी भारतीय है। क्योंकि
मुसलमान हिन्दू सभी अंग्रेज जैसे लगने लगे हैं।
पढ़ि विद्या परदेस की, बुद्धि विदेसी पाय । 
चाल-चलन परदेस की, गई इन्हें अति भाय ।।3।।
अर्थ विदेशी विद्या पढ़कर और विदेशी बुद्धि पाकर इनको (भारतवासियों को) विदेशी चाल-चलन बहुत अच्छा लगने लगा है।
ठटे बिदेसी ठाट सब, बन्यो देस बिदेस l 
सपनेहूँ जिनमें न कहुँ, भारतीयता लेस ।।4।।
अर्थ-विदेशी ठाट में बस सज गये हैं। देश भी विदेश जैसा लगने लगा है सपना में भी भारत के लोगों में भारतीयता नाम की कोई चीज नहीं बची है।
बोलि सकत हिंदी नहीं, अब मिलि हिंदू लोग । 
अंगरेजी भाखन करत, अंगरेजी उपभोग ।।5।।
अर्थ -  अब हिन्दू लोग भी परस्पर हिंदी में बात नही करते है l अंग्रजी बोलना और अंग्रजी वस्तु का उपयोग करना की भारतीयों को आच्छा लगता है l
अंगरेजी बाहन, बसन, वेष रीति औ नीति । 
अंगरेजी रुचि, गृह, सकल, बस्तु देस विपरीत ।।6।।
अंग्रेजी, वाहन, गोजी वस्त्र, अंग्रेजी वेशभूषा, अग्रेजी रीति-रिवाज, अंग्रेजी विचार,अंग्रेजी रुचि, मोजी भर आदि सभी चीजें देशी के विपरीत विदेशी लोगों को अच्छा लगने लगा है । 
हिन्दुस्तानी नाम सुनि, अब ये सकुचि लजात । 
भारतीय सब वस्तु ही, सों ये हाय घिनात ।। 7।।
अर्थ- हिन्दुस्तानी नाम सुनकर ही भारत के लोग लज्जित हो जाते हैं। भारतीय सभी वस्तु से भारतवासियों को घृणा हो गयी है।
देस नगर बानक बनो, सब अंगरेजी चाल । 
हाटन मैं देखहु भरा, बसे अंगरेजी माल ।। 8 ॥
अर्थ -सम्पूर्ण देशवासी की वेशभूषा शहरी हो गयी है सारे चाल-चलन में अंग्रेजीपन आ गया है। हजारों (ग्रामीण बाजारों) में अब केवल अंग्रेजी माल ही भरे दिखाई पड़ते हैं।
जिनसों सम्हल सकत नहिं तनकी, धोती ढीली-ढाली । 
देस प्रबंध करिहिंगे वे यह, कैसी खाम खयाली ।॥9 ॥
अर्थ - जिन नेताओं को शरीर की ढीली-ढाली भारतीय धोती संभाल में नहीं आती है वो देश का शासन सम्भाल लेंगे, यह तो उनकी कोरी कल्पना (ख्याली पुलाव बनाने) जैसी है। 
दास-वृत्ति की चाह चहूँ दिसि चारहु बरन बढ़ाली । 
करत खुशामद झूठ प्रशंसा मानहुँ बने डफाली ।।10।।
अर्थ- गुलामी कर के जीवन यापन करना ब्राह्मण क्षेत्रीय शद्र-वैश्य चारो वरणों के लोगों की चाहत हो गई है। अंग्रेजों की खुशामद करने वाले, भारतीय वस्तु की झूठी प्रशंसा करने वाले ये भारतीय मानो डफली बजाने वाले बन गये हों।

बोध और अभ्यास
कविता के साथ

1. कविता के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए। उत्तर "स्वदेशी" शीर्षक सार्थक है क्योंकि इस कविता में स्वदेशी लोगों को स्वदेशी वस्तुओं से नफरत जैसी हो गयी है। अपने देश के नाम सुनकर यहाँ के लोग लज्जा अनुभव करते हैं । सम्पूर्ण कविता में स्वदेशी वस्तु से अलग भारतीयों को दिखाया गया है अत: "स्वदेशी" शीर्षक यथार्थ है।
2. कवि को भारत में भारतीयता क्यों नहीं दिखाई पड़ती ?
 उत्तर भारत के लोगों का स्वभाव, रीति-रिवाज, लगाव सब अंग्रेजी जैसा हो गया है हिन्दू हो या मुसलमान सभी अंग्रेज जैसे दिखाई पड़ते हैं। भारतीयों को पहचान पाना भी मुश्कल हो गया है। विदेशी पढ़ाई, विदेशी बुद्धि विदेशी चाल-चलन ही सर्वत्र दिखाई पड़ता है। बाजार में भी सब जगह विदेशी वस्तु ही पसरे दिखते हैं इस प्रकार कवि को भारत में भारतीयता कहीं नजर नहीं आती है।
3. कवि समाज के किस वर्ग की आलोचना करता है और क्यों ? 
उत्तर- कवि समाज के प्रबुद्ध वर्ग की आलोचना करता है क्योंकि प्रबुद्ध वर्ग कहलाने वाले भारतीय लोग विदेशी विद्या पढ़कर, विदेशी बुद्धि पाकर अपने चाल-चलन को भी छोड़ दिये हैं। उनको विदेशी चाल-चलन ही अच्छा लगने लगा है अर्थात् प्रबुद्ध वर्गीय लोगों में भारतीयता नाम की चीज कहीं नहीं दिखाई पड़ती है। 
4. कवि नगर, बाजार और अर्थव्यवस्था पर क्या टिप्पणी करता है ?
उत्तर कवि भारत के नगर, बाजार और अर्थव्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि सब पर विदेशी वस्तु हावी हो गया है। सब जगह विदेशी वस्तु ही बिक रहे हैं। स्वदेशी वस्तु नगर, बाजार, कहीं भी नहीं दिखने के कारण अर्थव्यवस्था ही बिगड़ गयी है।
5. नेताओं के बारे में कवि की क्या राय है ?
उत्तर भारतीय नेताओं के बारे में कवि की राय है कि जब इन नेताओं को भारतीय ढीली-दाली धोती नहीं संभलता है तो फिर ये लोग देश की बागडोर की कैसे संभाल पाएँगे।
6. कवि ने "डफाली" किसे कहा है और क्यों ?
उत्तर- कवि ने भारतीय उन लोगों को "उफाली" कहा है जो भारतीय वर्ण व्यवस्या को मानते हैं। क्योंकि ये लोग गुलामी करके ही जीना चाहते हैं। अंग्रेजों की खुशामद करते है तथा अपने स्वदेशी वस्तुओं की झूठी प्रशंसा करते हैं।
7. व्याख्या करें-(क) मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान ।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश हमारे पाठ्य पुस्तक " गोधूली" भाग- 2 के स्वदेशी शीर्षक कविता मे लिया गया है। इस कविता के कवि बदरी नारायण चौधरी "प्रेमघन" जो हैं। इस कविता में कवि ने बताया है कि "स्वदेशी" वस्तु हम भारतीय के बीच से उठता जा रहा है। विदेशी विद्या, विदेशी बुद्धि के प्रभाव से हमारी चाल-चलन, वेश-भूषा खान-पान सब पर विदेशी वस्तु हावी हो गई है हम भारतीय विदेशी वस्तुओं के प्रयोग से इतने बदल गये हैं कि "मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान" अर्थात् भारतीय मनुष्य को देखकर कोई नहीं पहचान सकता है कि यह भारतीय नागरिक है,।
(ख) अंग्रेजी रुचि, गृह, सकल वस्तु देस विपरीत ।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश हमारे पाठ्य पुस्तक "गोधूली" भाग-2 के काव्य (पद्य) खण्ड के "स्वदेशी" शीर्षक पाठ से लिया गया है। इस पाठ के कवि "बदरी नारायण चौधरी 'प्रेमघन" जी हैं। "प्रेमघन" जी भारतीय लोगों के द्वारा स्वदेशी वस्तु के अनुपयोग से व्यथित हृदय होकर कहते हैं-" अंगरेजी रूचि, गृह सकल वस्तु देस विपरीत" अर्थात् अंग्रेजी वस्तु में रुचि बढ़ जाने से हमारे घर में सकल वस्तु विदेशी दिखाई पड़ने लगा है जो भारत के विपरीत है ।
8. आपके मत से स्वदेशी की भावना किस दोहे में सबसे अधिक प्रभावशाली है ? स्पष्ट करें। 
उत्तर-हमारे मत से स्वदेशी की भावना सबसे अधिक प्रभावशाली दोहे नं० 3 है जिसमें कवि ने कहा है कि पढि विद्या परदेश की, बुद्धि विदेसी पाप । अर्थात् अंग्रेजी शिक्षा और अंग्रेजी बुद्धि पाकर भारतीय लोगों को परदेशी चाल-चलन हो अच्छा लगने लगा है। चाल-चलन परदेस की गई इन्हें अति भाव ।। अर्थात् अंग्रेजी शिक्षा और अंग्रेजी बुद्धि पाकर भारतीय लोगों को परदेशी चाल-चलन ही अच्छा लगने लगा है।


भाषा की बात

1. निम्नांकित शब्दों से विशेषण बनाएं
उत्तर रुचि = रुचिकर । देस = देशी । नगर 3 नगरीय । प्रबंध - प्रबंधन। ख्याल - ख्याली । दासता = दास । झूठ = झुठा । प्रशंसा = प्रशंसनीय ।
2. निम्नांकित शब्दों का लिंग-निर्णय करते हुए वाक्य बनाएँ उत्तर- चाल-चलन (स्त्री)-राम की चाल-चलन बिगड़ गई है।
खाम ख्याली (स्त्री.)-तुम कैसी खाम खयाली करते हो। खुशामद (स्त्री)-उसकी खुशामद मत करो ।
माल (पुलिङ्ग)-माल बिक गया। वस्तु (स्त्री)- वस्तु बाजार में बिकती है। वाहन (स्त्री०)-वाहन बिगड़ गई।
रीत (स्त्री)--हमारी रीत पुरानी है। हाट (पु.)-गाँव-गाँव में हाट लगता है ।
दास वृत्ति (स्त्री)- दास वृत्ति अच्छी नहीं है।
बानक (पु.)- तुम्हारा बानक बिगड़ गया है।
3. कविता से संज्ञा पदों का चुनाव करें और उनके प्रकार भी बताएँ ।
उत्तर नर = जातिवाचक संज्ञा । मनुज = जातिवाचक संज्ञा । मुसलमान - जातिवाचक संज्ञा । हिन्दु = जातिवाचक संज्ञा । अंगरेजी  व्यक्तिवाचक संज्ञा। वाहन -जातिवाचवक संज्ञा । रुचि = भाववाचक संज्ञा । नगर = जातिवाचक संज्ञा । अंग्रेजी चाल = व्यक्तिवाचक । अंग्रेजी माल = व्यक्तिवाचक । दासवृत्ति = भाववाचक ।
समाप्त

बुधवार, 4 नवंबर 2020

अति सूधो सनेह को मारग है -घनानंद (वर्ग 10)

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अति सूधो सनेह को मारग है। 
   (प्रेम का मार्ग अति सरल है।)  

पद-परिचय—इस सवैये में प्रेम के मार्ग को सरल बताते हुए कहा है कि इसमें कोई खर्च नहीं लेकिन सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है।

भावार्थ—प्रेम का मार्ग अत्यन्त सरल मार्ग है । जिस मार्ग में चतुराई का टेढी चाल की कोई जगह नहीं है। इस मार्ग में सच्चाई का भी अभिमान ठिठक जाता है । इसमें कपटी लोग अपना स्थान नहीं बना पाते हैं। घनानन्द का कहना है कि हे प्यारे सज्जन, इस मार्ग के समान दूसरा कोई मार्ग नहीं है। इस मार्ग का अनुकरण करने वाले का कोई खर्च नहीं लेकिन प्राप्ति सब कुछ हो जाती है l 

व्याख्या करें—यहाँ एक तें. दूसरौं ऑक नहीं।
उत्तर-प्रस्तुत सवैये का अंश हमारे पाठ्यपुस्तक "गोधूली' भाग-2 के काव्य (पद्य) खण्ड के "अति सूधो स्नेह को मारग है" पद से लिया गया है जिसके रचयिता घनानंद हैं। इस पद में कवि ने "प्रेम मार्ग" को सुगम सरल, पवित्र कहते हुए कहा है कि यहाँ एक से दूसरौ आँक नहीं। अर्थात् प्रेम मार्ग के समान कोई दूसरा मार्ग नहीं है। प्रेम मार्ग ही अद्वितीय मार्ग है।

प्रश्न - "मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं" से कवि का क्या अभिप्राय है?
उत्तर-'मन लेहु पै देह छटाँक नहीं" से कवि घनानंद का अभिप्राय यह है कि "प्रेम मार्ग" ऐसा  मार्ग है जिस पर चलने वाले पथिक को कोई खर्च नहीं लेकिन प्राप्ति सब कुछ किया जा सकता है।  यहाँ मन (40 किलो) और छटॉक (कनमा) जो उस समय मन माप का सबसे बड़ा और छटाँक सबसे छोटा परिमाण माना जाता था।

प्रश्न - कवि कहाँ अपने आँसुओं को पहुंचाना चाहते हैं और क्यों ? 
उत्तर कवि अपने आँसुओं को सज्जन लोगों के आँगन तक पहुँचाना चाहता है क्योंकि सज्जन जन ही कवि को पीड़ा का अनुभव कर सकते हैं, कोई दुष्ट नहीं। इसीलिए कवि की आकांक्षा है कि मेरी पीड़ा सज्जन के आंगन तक पहुँचाकर परोपकारी मेघ मेरी पीड़ा को कम करने में मदद देगा।

प्रश्न - कवि प्रेम मार्ग को "अति सूघो" क्यों कहता है ? इस मार्ग की विशेषता क्या है ?

उत्तर-कवि प्रेम मार्ग को अति सूधो (अत्यन्त शुद्ध सरल) इसलिए कहा है क्योंकि इस मार्ग पर चलकर मनुष्य बिना खर्च किये हुए सब कुछ पा सकता है। इस मार्ग की विशेषता है कि इस मार्ग में सत्य का भी स्वाभिमान समाप्त हो जाता है तथा चतुराई का भी इस मार्ग में कोई स्थान नहीं रहता है।

शब्द निधि:
नेकु = तनिक भी । सयानप = चतुराई । बाँक= टेढ़ापन । आपन पौ = अहंकार, अभिमान । झुझुक = झिझकते हैं । निसाँक = शंकामुक्त । आँक = अंक, चिह्न । परजन्य = बादल । सुधा = रस बरसाओ। परसौ = स्पर्श करो। बिसासी=विश्वासी । मन = मन का एक पैमाना । छटाँक = माप-तौल का एक छोटा पैमाना ।



मो अँसुवानिहिं लै बरसौ। 
मेरे आँसुओं को ही लेकर बरस जाओ। 
पद परिचय-इस सवैये में कवि घनानंद ने मेघ को परोपकारी बताकर आग्रह करता है कि मेरे हृदय की पीड़ा को सज्जन लोगों के घर तक पहुँचा दो। 
भावार्थ - हे मेघ ! परजन्य नाम तुम्हारा सही है क्योंकि परोपकार के लिए ही देह धारण कर घूमते हो । समुद्र जल को भी तुम अमृत जैसा बनाकर अपने रसयुक्त घनानंद का कहना है कि  तुम जीवनदायक हो, कुछ मेरे हृदय की पीड़ा को भी स्पर्श करो। हे विश्वासी किसी भी समय  मेरी पीडारूपी आँसुओं को लेकर सज्जन लोगों के आँगन में बरस जाओ।
प्रश्न - 'मो सवानिहि लै बरसी छंद' किसे संबोधित है और क्यों?
उत्तर-द्वितीय छंद में मेघ को संबोधित किया गया है क्योंकि परजन्य परोपकार हेतु जो जन्म लिया हो कहलाकर मेघ अपने नाम की यथार्थता साबित करने के लिए परोपकार के लिए lघूम-घूमकर कर बरसता है।

प्रश्न - परहित के लिए ही देह कौन धारण करता है ? स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर–परहित के लिए ही देह मेघ धारण करता है। मेघ परोपकारी होता है। घूम-घूमकर लोक हित के लिए बरसता है। इसलिए मेघ का एक नाम "परजन्य" भी है।
व्याख्या करें- कछू मेरियो पीर हिए परसौ। 
उत्तर–प्रस्तुत सवैये का अंश हमारे पाठ्यपुस्तक "गोधूली" भाग-2 के काव्य (पद्य) खण्ड के "मो अँसुवानिहिं लै बरसौ" पद से लिया गया है जिसके रचयिता प्रेममार्गी कवि 'घनानंद" है कवि ने इस पद में मेघ को परोपकारी कहते हुए मेघ से कवि के आँसुओं को परोपकार हेतु लेकर सज्जन के आँगन में बरसाने का आग्रह करता है। इस पद्यांश में कवि की इच्छा है कि जीवनदायक मेघ हमारे हृदय की पीड़ा को भी अपने स्पर्श से सुखकारी बना देगा। क्योंकि मेघ का कार्य ही है दूसरों को सुख पहुँचाना।


कवि परिचय-

रीति काल के रीति मुक्त काव्यधारा के सिरमौर, "प्रेम की पीर" के कवि घनानंद का जन्म 1689 ई. के आस-पास दिल्ली में हुआ था । वे दिल्ली के तत्कालीन मुगल बादशाह मोहम्मद शाह गीले के यहाँ मीरमुंशी का काम करते थे। वे अच्छे गायक और श्रेष्ठ कवि थे। सुना जाता है कि सुजान मामक नर्तकी से इनको प्यार था। कुछ कारण से सुजान के प्रति उनकी विरक्ति हो गई । विराग होने पर वे दिल्ली छोड़कर वृंदावन चले गये। वहाँ वैष्णव बनकर काव्य रचना करने लगे। 1739 ई० में जब लुटेरा नादिरशाह का दिल्ली पर आक्रमण हुआ तो उसके सैनिकों ने वृंदावन पर भी आक्रमण किया। घनानंद भी पकड़े गये । सैनिकों ने उनसे सोना माँगा तो घनानन्द 
ने सिपाहियों के हाथ पर धूल रख दिया। गुस्सा में आकर सैनिकों ने इनको मार दिया । घनांनद  के प्रमुख ग्रन्थ हैं-"सुजान सागर" "विरह लीला", "रस केलि बल्ली" "घन आनंद" आदि घनानंद की काव्य रचना सवैये या घनाक्षरी में हैं तथा इनके काव्यों में प्रेम-राग, प्रेम-विरह दोनों दिखाई पड़ते हैं। इनकी भाषा ब्रजभाषा है l 
भाषा की बात
1.निम्नांकित शब्द कविता में संज्ञा अथवा विशेषण के रूप में प्रयुक्त हैं। इनके प्रकार बताएँ-
सूधो-विशेषण । मारग-संज्ञा । नेकु-संज्ञा । वाँक—विशेषण । कपटी—संज्ञा ।. निसाँक-विशेषण । पाटी-संज्ञा । जथारथ-संज्ञा । जीवनदायक विशेषण । पीर-संज्ञा । हियें-संज्ञा ।
2. कविता में प्रयुक्त अव्यय पदों का चयन करें और उनका अर्थ भी बताएँ।
उत्तर-अव्यय, अर्थ-अति-अधिक, जहाँ-जिस जगह, तहाँ-उस जगह-यहाँ-इस जगह,कछू-कुछ (थोड़ा)
3. निम्नलिखित के कारक स्पष्ट करें-
स्नेह को मारग = सम्बन्ध कारक । प्यारे सुजान कर्मधारय । मेरियौ पीर सम्बन्ध कारक। हियें = सम्बन्ध कारक । अँसुवानिहिं = कर्म कारक । मो = सम्बन्ध कारक।

समाप्त 

सोमवार, 26 अक्टूबर 2020

प्रेम अयनि श्री राधिका -रसखान

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प्रेम अयनि श्री राधिका  -रसखान

पद परिचय–इस दोहे में रसखान भगवान श्रीकृष्ण और राधिका जी के युगल स्वरूप को प्रेम का खजाना कहा है। अर्थात् राधा कृष्ण के युगल स्वरूप की जो भक्ति करता है उसे भगवान श्रीकृष्ण अपने रंग में रंगकर प्रेममय कर देते हैं।
भावार्थ-श्री राधिका प्रेम के खजाना है तो श्रीकृष्ण उनके प्रेम रंग में रंगा प्रेमी हैं। दोनों एक ही प्रेम वाटिका के दो नायक (माली-मालीन) है। मोहन के रूप सौन्दर्य को देखकर रसखान की ये आँखें अपने वश में नहीं रहा अर्थात् वरवक्त उन्हीं के प्रेममय स्वरूप के प्रति ये आँखें युगल स्वरूप पर टिकी रहती हैं उसी प्रकार जैसे बाण को खींचते धनुष से छुटकर चला जाता है। 
                                                                    मेरे मनरूपी माणिक्य (रल) देखकर चितचोर कहलाने वाले नन्द के नन्दन चुरा लिए । जब मैं बिना मन वाला हो गया तो क्या कर सकता हूँ। मैं तो श्रीकृष्ण और राधिका के प्रेमपाश में फंस गया हूँ। हे प्रिय नन्दकिशोर जिस दिन से आपके स्वरूप का दर्शन इन आँखों को हुआ है, उस दिन से मेरा मन पवित्र हो गया । हे चितचोर मैं अपने पलकों को आपके छवि दर्शन से अलग न कर सकूँ ऐसी मेरी इच्छा है।

पद परिचय–सवैये में प्रस्तुत पद में रसखान श्रीकृष्ण की भक्ति में अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हैं।
भावार्थ-जिन्होंने छोटी लाठी, कम्बल पर तीन लोक का राज त्याग दिये तथा आठो सिद्धि और नवनिधियों के सुख को भी नन्द के गाय चराने के पीछे भूल गये हों। उस श्रीकृष्ण को देखने के लिए ये आँखें कब (बहुत दिनों) से ब्रज के वन, उपवनों और तालाब को निहार (देख) रहा है। उनके दर्शन हेतु इन्द्र के करोड़ों स्वर्ग को प्रेमवाटिका स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण के ऊपर बलिदान कर दूं। ऐसी मेरी अभिलाषा है।
कविता से क्रिया रूपों का चयन करते हुए उनके मूल रूप को स्पष्ट करें-
उत्तर-लखि = लख (देखना)। आवत = आव (आना) । जाहिं = जा (जाना) । लै गयो  = ले जाना । करूँ = कर (करना) । लग्यौ = लग (लगना)। सकौं शक् (सकना)। डारौ डाल (डालना) । चराई = चर (चरना) । निहारौ निहारना । वारौं = वारण (त्याग, न्योछावर)।
शब्द निधि:
अयनि गृह, खजाना। बरन वर्ण, रंग । दृग = आँख । अँचे खिंचे। सर = वाण ।मानिक (माणिक्य) रत्न विशेष । चितै देखकर । लकुटी = छोटी लाठी । कामरियां = कंबल, कंबली । तिहूँपुर = तीनों लोक । बिसारौं विस्मृत कर दूँ, भुला दूँ । तड़ाग = तालाब । कोटिक = करोड़ों । कलघौत = इन्द्र । वारौं न्योछावर कर दूँ । कुंजन = बगीचा (कुंज का बहुवचन)।

कविता के साथ

1. कवि ने माली-मालिन किन्हें और क्यों कहा है?
उत्तर-कवि रसखान ने प्रेमवाटिका के माली श्रीकृष्ण को तथा मालिन राधिका को कहा है। क्योंकि दोनों प्रेम रूपी वाटिका के संरक्षक हैं। जैसे—माली-मालिन मिलकर फूल के बगीचा को सिंचते हैं जिससे फूल खिलते हैं उसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण और राधिका प्रेमरूपी वाटिका को सिंचकर को पुष्ट (विकसित) करते हैं।
2. द्वितीय दोहे का काव्य सौंदर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-दूसरा दोहा (सवैये) में कवि रसखान की अनुपम भक्ति देखने को मिलती है जिसमें कवि श्रीकृष्ण की भक्ति पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हैं। सौन्दर्य की दृष्टि से भी यह सवैये अनुपम हैं शब्दालंकार के प्रयोग से यह दोहा आकर्षक बन गया है।
3. कृष्ण को चोर क्यों कहा गया है? कवि का अभिप्राय स्पष्ट करें।
उत्तर-चितचोर कहलाने वाले भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों के मन को शीघ्र ही अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं इसलिए कवि ने उन्हें चोर कहा है। अभिप्राय यह है कि मनुष्य जब श्रीकृष्ण की भक्ति की ओर मुखरित होता है तो उसका मन श्रीकृष्ण की ओर स्वयं खिंच जाता है इसलिए वे चित्तचोर कहलाते हैं
4. सवैये में कवि की कैसी आकांक्षा प्रकट होती है ? भावार्थ बताते हुए स्पष्ट करें।
उत्तर-द्वितीय दोहे में कवि ने सवैये का प्रयोग किया है जिसमें कवि रसखान ने आकांक्षा व्यक्त की है कि अगर श्रीकृष्ण की भक्ति के लिए मुझे करोड़ों स्वर्ग-सुख को त्यागना पड़े तो त्याग सकता हूँ।
5. व्याख्या करें-(क) मन पावन चित्त चोर, पलक ओर नहि करि सकौं।
उत्तर प्रस्तुत पद्यांश हमारे पाठ्यपुस्तक "गोधूली" भाग-2 के काव्य (पद्य) खण्ड के "प्रेम-अयनि श्री राधिका" पाठ से लिया गया है जिसके कवि रसखान हैं। जिसमें कवि ने राधा कृष्ण के युगल स्वरूप को प्रेम का खान कहकर अपनी भक्ति की अभिव्यक्ति की है। इस पंक्ति में रसखान ने भगवान श्रीकृष्ण को मन पावन करने वाला तथा चित चुराने वाला (चित्तचोर) कहते हुए कहा है कि एक क्षण के लिए भी मैं उनसे अपने को अलग नहीं कर सकता हूँ।
(ख) रसखानि कबौं इन आँखिन सौ ब्रज के बनबाग तडाग निहारौं ।
उत्तर–प्रस्तुत पद्यांश हमारे पाठ्य पुस्तक "गोधूलो" भाग-2 के काव्य (पद्य) खण्ड के "करील कुंजन ऊपर वारौं" पाठ से लिया गया है जो रसखान की रचना है। इस सवैये में कवि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और दर्शन प्राप्त करने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हैं। इसी आकांक्षा में कवि कहते हैं आपका भक्त रसखान आपके दर्शन हेतु कब से (बहुत दिनों से) ब्रज के वन, बाग और तडाग की ओर अपनी आँखें लगाये हुए है।
भाषा व्याकरण 
समास-निर्देश करते हुए निम्नलिखित पदों का विग्रह करें-
उत्तर-
पद                                विग्रह                समास के नाम
प्रेम-अयनि                प्रेम के अयनि                तत्पुरुष समास
प्रेम बरन                प्रम का बरन                    तत्पुरुष समास
नंद नंद                 नँद के नन्द                      तत्पुरुष समास
प्रेमवाटिका             प्रेम की वाटिका                 तत्पुरुष समास
माली-मालिन        माली और मालिन                द्वन्द्व समास
रसखानि                रस के खानि                    तत्पुरुष समास
चितचोर                चित्त के चोर                    तत्पुरुष समास
मनमानिक            माणिक जैसा मन                कर्मधारय समास
वेमनन                बिना मन का                        
नञ   समास
नवोनिधि                नव निधि का समूह                द्विगु समास

आठहुँ सिद्धि            आठ सिद्धि का समूह                 द्विगु समास
बन बाग                    वन और बाग                    द्वन्द्व समास
तिहूँपुर                तीन पुरों का समाहार                 द्विगु समास
 
निम्नलिखित के तीन-तीन पर्यायवाची शब्द लिखें-
राधिका = राधा, कृष्ण-प्रिया, रास नायिका। नँद नंद कृष्ण, चित्त चोर, वासुदेव, l नैन आँख, नेत्र, दृष्टि। सर = वाण, तीर। आँख नेत्र, चक्षु, दृष्टि। कुंज = वाटिका, उपवन, बाग।कलघौत इन्द्र, देवराज, बज्रपाणी ।

कवि परिचय 
"प्रेम वाटिका" का कवि परिचय-कृष्ण भक्त, मुसलमान संतों में "रसखान" अग्रणी हैं। "रसखान" जन्म दिल्ली के पठान वंश के राजघराने में हुआ था। बाबर के आक्रमण से पठान वंश का अंत हो गया तथा दिल्ली पर मुगलवंश का शासन कायम हो गया । पराजित राजवंश के रसखान दिल्ली से भागकर व्रज भूमि आकर श्री कृष्ण की भक्ति में लीन हो गये। वे अपना गुरु गोस्वामी विट्ठलनाथ को माना । जिन्होंने रसखान को पुष्टि मार्ग की दीक्षा दी। रसखान के रचित ग्रन्थ हैं-"प्रेमवाटिका" और "सुजान रसखान"।
रचना काल 1610 माना गया है जिसमें कृष्ण भक्ति पर आधारित दोहे, सवैये आदि उपलब्ध हैं।
समाप्त 

शनिवार, 24 अक्टूबर 2020

राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा- गुरुनानक

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राम नाम बिनु बिरथे जगि जनमा- गुरुनानक 

अध्याय 1





सरलार्थ - राम नाम के बिना जग में जन्म लेना ही बेकार है। जो व्यक्ति हरिनाम नहीं लेता उसका किया भोजन विष के समान, उसकी बोली विष के समान हो जाती है तथा जो ईश्वर का नाम नहीं लेता उसका जीवन निष्फल तथा बुद्धि भ्रमित हो जाती है। पुस्तक का पाठ करना, व्याकरण की व्याख्या करना संध्या-कर्म आदि सब निष्फल हो जाता है। वह मुरु उपदेश के अनुकरण किये बिना मुक्ति नहीं मिलती है तथा राम नाम के जप बिना प्राणी इस मोह युक्त संसार रूपी जाल में उलझकर मर जाता है। दंड-कमंडल धारण, शिखा बढ़ाना, जनेऊ पहनना, धोती पहनना या तीर्थ भ्रमण करना सब बेकार हो जाता है यदि व्यक्ति नाम का जप नहीं करता है। राम नाम के जप के बिना शांति भी नहीं मिलता है तथा जो हरि का नाम स्मरण करता है उसी का वेरा पार होता है। जटा धारण, भस्म लगाना, दिगम्बर हो जाना सब बेकार है हरि नाम के बिना । इस पृथ्वी पर जितने जीव-जन्तु जल-थल में हैं उन्हीं की कृपा से जीवित है । जिसने गुरु उपदेश को ग्रहण कर लिया है मानो वह हरि भक्ति का रस-पान कर लिया ।


सरलार्थ-जो मनुष्य अपने दुःखी नहीं होता है। सुख-स्नेह और भय भी जिसको प्रभावित नहीं करता है, जो दूसरे के धन को माटी मानता है, जिसे निन्दा, प्रशंसा, लोभ, मोह और अभिमान प्रभावित नहीं करता है जिसको हर्ष या शोक प्रभावित नहीं करता है, जो मान अपमान नहीं समझता है, जो मन से आशा, तृष्णा आदि सब कुछ त्यागकर देता है तथा जो सांसारिक माया से मुक्त रहता है जिसको काम, क्रोध आदि स्पर्श भी नहीं करता है। ऐसे व्यक्ति के ही हृदय में ईश्वर का निवास होता है। जिस व्यक्ति पर गुरु की कृपा हो जाती है वही व्यक्ति इस रहस्य को जान सकता है। गुरु नानक कहते हैं कि ईश्वर भक्ति में इस प्रकार लीन हो जाओ जैसे नदी का पानी समुद्र के पानी में मिलकर लीन हो जाता है।