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मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

जीवन है तो मुश्किलें है !

i'msonuamit



जीवन है तो  मुश्किलें है!

जीवन है तो मुश्किलें है ; और जब तक जीवन रहेंगी मुश्किलें रहेंगी ! यह और बात है की मुश्किलों का स्वरुप हर आयाम के साथ नया और अलग हो जाता है l कहते है ‘ सांसारिक जीवन तूफानी लहर से भरा है जिसमें कर्म और भाग्य की उत्ताल तरंगे मनुष्य को उद्वेलित करती रहती है’ l WHO के 2016 आकड़ें अनुसार 800,000 लोग जीवन के संघर्ष से भाग कर अपना जीवन लीला समाप्त करने का रास्ता अपना लेते है, वही इन आकड़ो में 17% लोग सिर्फ भारत के है, तो सोचने वाली बात यह है की क्या वाकई आत्महत्या करना जीवन में संघर्ष करने से ज्यादा आसान है ? इन तथ्यों पर विचार करने पर कई बातें निकल कर सामने आती है जिस कारण लोग खास कर छात्र आत्महत्या कर जीवन समाप्त कर लेते है -

1. छात्रों में सहनशक्ति की कमी एक बड़ा कारण है l साथ ही... जैसे इम्तिहान में फेल होने का डर प्रेम में नाकामी तथा आर्थिक समस्या l
2. मौजूदा दौर में लगातार प्रतिस्पर्धा और सामाजिक परिवारिक संरचना की असीमित अपेक्षाओं का दबाव
3. बेरोजगारी और असफलता के मार की आत्महत्या का कारण है l
4. वर्तमान समय में परिवार एकाकी हो गए हैं और बच्चों को नाना-नानी दादा-दादी का प्यार और सहारा ना मिला आत्महत्या का कारण माना जा सकता है l आधुनिकरण में आपसी परस्पर संवाद को कमतर किया है l
5.भारतीय समाज में मानसिक अवसाद को बीमारी के रूप में ना देखना भी इसका प्रमुख कारण हैl
6. वर्तमान समय में लोगों का प्रेम और लगाव मानव से कम भौतिक वतुओं से अधिक हो जाना भी एक कारण हो सकता है l

इसका समाधान हो सकता है , इसमें कोई संदेह नहीं है कि जीवन में अगर समस्या है तो उसका समाधान नहीं है l निरंतर गतिशील दुनिया में आज छात्रों को साकारात्मक सोच अपनाने के लिए साथ-साथ अपनी छोटी उपलब्धियों को भी बता देना आवश्यक हैl छात्रों को अपनी क्षमता व जीवन के समय सामंजस्य स्थापित करने की कला को सिखाया जाना चाहिए l 

निष्कर्ष अवसाद और आत्महत्या नहीं दौर की महामारी के रूप में उभर कर सामने आ रहा है आज हम सब को एकजुट होकर इस के प्रति जागरूकता पैदा करनी चाहिए नहीं तो देश के भविष्य कहे जाने वाले छात्रों को इसका भारी धन देना पड़ेगा जो कि अविश्वसनीय होगा l 

#iamsonuamit

सोमवार, 17 अगस्त 2020

मेरे सच्चाई की कहानी

i'msonuamit


मै सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र जैसा तो नहीं, लेकिन सत्यवादी बनने का जरूर प्रयत्न करता रहा हूं। जब की आप अपने चारों तरफ़ नजर घुमाएंगे तो सिर्फ झूठ का बोल बाला है, पाएंगे। सच- झूठ का अपने में इस कदर भाईचारा हो गया है कि पता ही नहीं चलता है कि सच कौन और झूठ कौन !

अब यह कह दिया जाए की शुद्ध सच का लोप हो गया है संसार से , तो ठहर जाइए ऐसा नहीं है । वर्तमान की स्थिति यह है की किसी की बातों में यदि सच का प्रतिशत अधिक होता है तो कम सच प्रतिशत के सामने उसे शुद्ध सच ही कहा जाता है। एक आदर्श कथन हमारे महान देश का ' सत्यमेव जयते' शोभा की वस्तु प्रतीत होता है। हालांकि किन किन लोगो के आचरण में शामिल है आप ही निर्णय कर लीजिए ना । इन दिनों मैं सच बोलने का भरसक प्रयत्न किया करता हूं।  14 साल का था मै, ठीक ठीक याद है की बहुत असमंजस वाली स्थिति से गुजरा था, मतलब झूठ बोले तो पकड़े जाने पर पिटाई होती थी । और यदि सच बोला तो झूठ बोलने से जायदा कुटाई होती थी। मतलब करे तो करे क्या? तब हमारे गणित के गुरु जी ( नाम क्या लेना ), ने रास्ता दिखाया कि " यदि जरूरत ना हो तो झूठ नहीं बोलना है " और इन्हीं तथ्यो के आधार पर दावा कर सकता हूं की जो भी अच्छा खराब बोला हूं उसमे निश्चित सच का प्रतिशत अधिक रहा होगा । किसी व्यक्ति में अच्छाई और बुराई में जिसका पलरा भारी होता है उसी के कारण वह जाना जाता है। अब ना तो कोई सत प्रतिशत सच्चा होता है और ना ही सत प्रतिशत झूठा होता है, तो इसी आधार पर मै खुद को सत्यवादी मानता रहा हूं। 

हालांकि सत्यवादी होने का प्रमाण आपको मेरे दोस्तो से भी मिल सकता है। वो कहते है ना कि हर एक दोस्त कमीना होता है, लेकिन मेरे लिए मेरे लिए मेरा कोई दोस्त कमीना नहीं है।

वो दिन बाकी दिनों के जैसे बिल्कुल नहीं था जब मुझे मेरे स्कूल के गुरुजी छड़ी से खदेड़ते हुए स्कूल ले गए थे, बस मुझे यही दिन याद है बांकी इसके ठीक एक दिन पहले और बाद की घटना मुझे जरा भी याद नहीं। अपने बराबर के परिचित लड़कों के बीच ही बैठाया गया था। सब के सब छठे हुए शरारती थे। गुरु जी आए और जादूगर के समान हवा में छड़ी घुमा कर बोले " सदा सच बोलो " मैंने तो बस कसम खा ली क्यों की वजह भी थी कसम खाने की पूरी रास्ते गुरु जी स्कूल कूटते हुए लाए थे। हमको लगा यही महलम है। वैसे भी अपना क्या ही जाता है , सब कहते है तो लो सच ही बोलेंगे और सच के सिवा कुछ नहीं बोलेंगे।

कुछ दिन बाद मुझे क्रिकेट के कीड़े से काट लिया। क्लास छोड़ कर चला गया । दूसरे दिन पुछने पर गुरु जी को सारा वाकया सुना दिया। आगे की कहानी बताने की जरूरत ही क्या है, आप खुद समझ जाओ गुरु जी क्या किए होंगे। मेरे सहपाठी जो अब दोस्त बन गए थे, ने मेरे हसी उड़ाई , सबने कहा झूठ ही बोल देते देते। इस स्थिती में बहाने ही काम आते है। एक और सीख मिल चुका था। यह तो बिल्कुल नया सा ज्ञान था, खैर मैंने ग्रहण कर लिया।

हालांकि मैंने दूसरा रास्ता भी अपनाया था, वहीं बहाना वाला , लेकिन वो भी काम नहीं आया।आलम यह रहा कि सच का प्रतिशत जायदा रहा और कुटाई का प्रतिशत भी । झूठ बोलना भी एक कला है। हर किसी के बस की बात नहीं है श्रीमान।

लेकिन थोड़ा चालक जरूर हो गया था, फिर भी सफेद झूठ बोलने कभी नहीं आ पाया। बस मुहावरों के कॉलम में याद किया कि सफेद झूठ मतलब सारा - सर झूठ।

मतलब अब सच्चाई का प्रमाण कसम खाने से सिद्ध करने लगा था। मतलब कोई बात यदि सामने वालों को भ्रामक लगे तो कसम खाओ। जैसे विद्या कसम, और कोई भी प्रिय वस्तु या व्यक्ति का कसम। कसम खाने की अंदाज़ कुछ ऐसा होता था कि कसम खा कर न्यूटन के सिद्धांतों को भी झुठलाया जा सकता था।

हर रोज एक नई कसम , टुकड़े टुकड़े के कसम खाते चेहरे पर मूंछें आने लगी थी। उस समय तक यदि सच का प्रतिशत निकाला जाता तो 17 साल के उम्र तक सच्चाई के प्रितिशत से पाचवी तो जरूर पास हो सकता था।

मेरे कान भी गवाह है, बहुत खींचे गए हैं सच बोलने पर, लेकिन उसने कभी शिक़ायत नहीं किया।

कभी कभी ऐसे परिस्थिती से सामना हुआ की सच बोलने से थकावट सी होने लगी थी। आख़िर अकेला मै ही कब तक सच बोलता रहूंगा। जैसे पूरे तलाब में एक ही साफ मछली है।

मेरा ऐसा मानना शुरू से नहीं रहा हैं , कुछ खास परिस्थिती के कारण शायद । आख़िरकार झूठ और सच के चक्की के बीच मैंने खुद की हितो की रक्षा करना भी सीख गया।

मैंने गणित वाले गुरुजी की सीख को अपने जीवन में उतर लिया । और अब 24 साल का एक बड़ा सा जीवन जी चुका हूं और अब सच का प्रतिशत दसवीं कक्षा पास करवाने के लायक हो गया है।

मैंने अपने मासूम से चेहरे के साथ सत्य बोलने वाले व्यक्ति का वो मुकाम हासिल कर लिया है कि जिसके पीछे तो कुछ - कुछ झूठ भी सच ही होते है । वो भी बिना शक किए। लेकिन एक मै ऐसा दावा कर सकता हूं कि झूठ और सच के बीच जीवन जीना एक कला है और इस कला को सीखने में मेरे दोस्तों ने भी पसीने धन्वामै सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र जैसा तो नहीं, लेकिन सत्यवादी बनने का जरूर  प्रयत्न करता रहा हूं। जब की आप अपने चारों तरफ़ नजर घुमाएंगे तो सिर्फ झूठ का बोल बाला है,  पाएंगे। सच- झूठ का अपने में इस कदर भाईचारा हो गया है कि पता ही नहीं चलता है कि सच कौन और झूठ कौन !

अब यह कह दिया जाए की शुद्ध सच का लोप हो गया है संसार से , तो ठहर जाइए ऐसा नहीं है । वर्तमान की स्थिति यह है की किसी की बातों में यदि सच का प्रतिशत अधिक होता है तो कम सच प्रतिशत के सामने  उसे शुद्ध सच ही कहा जाता है। एक आदर्श कथन हमारे महान देश का  ' सत्यमेव जयते ' शोभा की वस्तु प्रतीत होता है। हालांकि किन किन लोगो के आचरण में शामिल है आप ही निर्णय कर लीजिए।  मै भी आज की दिनों ने सच बोलने का भरसक प्रयत्न किया करता हूं। हालांकि मै 14 साल का था, ठीक ठीक याद है मुझे बहुत असमंजस वाली स्थिति से गुजरा था, मतलब झूठ बोले तो पकड़े जाने पर पिटाई होती थी । और यदि सच बोला तो झूठ बोलने से जायदा कुटाई होती थी। मतलब करे तो करे क्या? तब हमारे गणित के गुरु जी ( नाम क्या लेना ), ने रास्ता दिखाया कि " यदि जरूरत ना हो तो झूठ नहीं बोलना है " और इन्हीं तथ्यो के आधार पर दावा कर सकता हूं की  जो भी अच्छा खराब बोला हूं उसमे निश्चित सच का प्रतिशत अधिक रहा होगा । किसी व्यक्ति में अच्छाई और बुराई में जिसका पलरा भारी होता है उसी के कारण  वह जाना जाता है।  अब ना तो कोई सत प्रतिशत सच्चा होता है और ना ही सत प्रतिशत झूठा होता है, तो इसी आधार पर मै खुद को सत्यवादी मानता रहा हूं। 

हालांकि सत्यवादी होने का प्रमाण आपको मेरे दोस्तो से भी मिल सकता है। वो कहते है ना कि हर एक दोस्त कमीना होता है, लेकिन मेरे लिए मेरे लिए मेरा कोई दोस्त कमीना नहीं है।

वो दिन जब मुझे मेरे स्कूल के गुरुजी छड़ी से खदेड़ते हुए स्कूल ले गए थे, बस मुझे यही दिन याद है बांकी इसके ठीक एक दिन पहले और बाद की घटना मुझे जरा भी याद नहीं। अपने बराबर के परिचित लड़कों के बीच ही बैठाया गया था। सब के सब छठे हुए शरारती थे। गुरु जी आए और जादूगर के समान हवा में छड़ी घुमा कर बोले " सदा सच बोलो " मैंने तो बस कसम खा ली क्यों की वजह भी थी कसम खाने की पूरी रास्ते गुरु जी स्कूल कूटते हुए लाए थे। हमको लगा यही महलम है। वैसे भी अपना क्या ही जाता है , सब कहते है तो लो सच ही बोलेंगे और सच के सिवा कुछ नहीं बोलेंगे।

कुछ दिन बाद मुझे क्रिकेट के कीड़े से काट लिया। क्लास छोड़ कर चला गया । दूसरे दिन पुछने पर गुरु जी को सारा वाकया सुना दिया। आगे की कहानी बताने की जरूरत ही क्या है, आप खुद समझ जाओ गुरु जी क्या किए होंगे। मेरे सहपाठी जो अब दोस्त बन गए थे, ने मेरे हसी उड़ाई , सबने कहा झूठ ही बोल देते देते। इस स्थिती में बहाने ही काम आते है। एक और सीख मिल चुका था। यह तो बिल्कुल नया सा ज्ञान था, खैर मैंने ग्रहण कर लिया।

हालांकि मैंने दूसरा रास्ता भी अपनाया था, वहीं बहाना वाला , लेकिन वो भी काम नहीं आया।

आलम यह रहा कि सच का प्रतिशत जायदा रहा और कुटाई का प्रतिशत भी । झूठ बोलना भी एक कला है। हर किसी के बस की बात नहीं है श्रीमान।

लेकिन थोड़ा चालक जरूर हो गया था, फिर भी सफेद झूठ बोलने कभी नहीं आ पाया। बस मुहावरों के कॉलम में याद किया कि सफेद झूठ मतलब सारा - सर झूठ।

मतलब अब सच्चाई का प्रमाण कसम खाने से सिद्ध करने लगा था। मतलब कोई बात यदि सामने वालों को भ्रामक लगे तो कसम खाओ। जैसे विद्या कसम, और कोई भी प्रिय वस्तु या व्यक्ति का कसम।  कसम खाने की अंदाज़ कुछ ऐसा होता था कि कसम खा कर न्यूटन के सिद्धांतों को भी झुठलाया जा सकता था।

हर रोज एक नई कसम , टुकड़े टुकड़े के कसम खाते चेहरे पर मूंछें आने लगी थी। उस समय तक यदि सच का प्रतिशत निकाला जाता तो 17 साल  के उम्र तक सच्चाई के प्रितिशत से  पाचवी तो जरूर पास हो सकता था।

मेरे कान भी गवाह है, बहुत खींचे गए हैं सच  बोलने पर, लेकिन कभी शिक़ायत नहीं किए।

कभी कभी ऐसे परिस्थिती से सामना हुआ  की सच बोलने से थकावट सी होने लगी थी। आख़िर अकेला मै ही कब तक सच बोलता रहूंगा। जैसे पूरे तलाब में एक ही साफ मछली है।मेरा ऐसा मानना शुरू से नहीं रहा हैं , कुछ खास परिस्थिती के कारण शायद । आख़िरकार झूठ और सच के चक्की के बीच मैंने खुद की हितो की रक्षा करना भी सीख लिया।

मैंने गणित वाले गुरुजी की सीख को अपने जीवन में उतर लिया । और अब 24 साल का एक बड़ा सा जीवन जी चुका हूं और अब  सच का प्रतिशत दसवीं कक्षा पास करवाने के लायक हो गया है।

मैंने अपने मासूम से चेहरे के साथ सत्य बोलने वाले व्यक्तित्व का वो मुकाम हासिल कर लिया है कि जिसके पीछे तो कुछ - कुछ झूठ  भी सच ही होते है । वो भी बिना शक किए। लेकिन एक मै ऐसा दावा कर सकता हूं कि झूठ और सच के बीच जीवन जीना एक कला है और इस कला को सीखने में मेरे दोस्तों ने भी खूब मदद किए । धन्यवाद् ।

आपको मेरा पोस्ट कैसा लगा, कमेंट करके जरूर बताएं। 


रविवार, 26 जुलाई 2020

दिल बेचारा से फिर दिल जीत ले गए सुशांत!

i'msonuamit
"एक था राजा एक थी रानी दोनों मर गए ख़तम कहानी" इस लाइन के साथ कहानी ख़तम नहीं शुरू होती है । अब आप समझ गए होंगे मै बात कर रहा हूं सुशांत सिंह राजपूत की आखरी फिल्म #dilbechara की । यह फिल्म आखरी सलाम है अपने चाहने वालों के लिए सुशांत सिंह राजपूत की तरह से। फिल्म की कहानी शुरू होते ही इस कदर आपको अपने से जोड़ लेता है कि सुशांत सिंह आपको अपने इर्द गिर्द महसूस होने लगते है। यदि आपको लगता हैं कि मै फिल्म की समीक्षा कर रहा हूं तो जरा ठहर जाइए, मै कोई फिल्म समीक्षक नहीं। लेकिन मै यह कह सकता हूं कि यह फिल्म एक बेहतरीन फ़िल्म है और आप सभी को यह फिल्म देखनी चाहिए। "एक था 'राजा' एक थी 'रानी' दोनों मर गए खत्म हुई कहानी".....'चल झूठी'..... 'जिस तरह उसने मेरी लाइफ में एंट्री लिया था, उसी तरह उसने मेरी लाइफ से एग्जिट ले लिया.... 'सरी'- ऐसे ही कई डायलॉग्स है,जो दिल बेचारा फिल्म में देखने और सुनने को मिलेंगे। कुछ सीन तो आपके दिल से ऐसे टक से छू के जाएगी। मै यह दावा कर सकता हूं कि आपके आंखो से आँसू जरूर गिरेंगे...
जाते - जाते यह फ़िल्म आपको ज़िन्दगी को जीने का पाठ पढ़ा कर जाएंगे। 

अमित भट्टाचार्य की लिखी ए आर रहमान सर की आवाज और संगीत बद्ध किया ....वो गाना जो फिल्म ख़तम होने के बाद भी कानों के गूंजते रहते है..... दिल बेचारा, फ्रेंड जोन का मारा.....
चलते चलते यही कहेंगे कि आप एक बार फिल्म जरूर देखे और बताए की फिल्म कैसा लगा...
#iamsonuamit 
Trailer Dil Bechara


शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

एक प्रेम पत्र....

i'msonuamit
जीवन जब इस वैश्विक महामारी से पार पा लेगा... तब शायद आऊंगा तुम्हारे पास! तेरी शहर तेरी गलियों को अपना  बनाने..😉
तब तक के लिए मुझे दुआओ में याद रखना। कभी तन्हाई सताए , तो गुफ्तगू कर लेना बादलों से। भेज देना कोई पैगाम, अनगिनत बोसे लिए। वो जब संदेश लाएगा,  हमरा मन भीग जाएगा स्नेह के गागर में, और तब तुम अकेली नहीं होगी.....☺️
#iamsonuamit

गुरुवार, 4 जून 2020

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता.....

i'msonuamit

सर्वभूतेषु, मातृरूपेण, शक्तिरूपेण, श्रद्धारूपेण  संस्थिता

सर्वभूतेषु, मातृरूपेण, शक्तिरूपेण, श्रद्धारूपेण संस्थिता कहकर स्त्री की वंदना आदि काल से की जाती रही है।
परन्तु जब विश्वामित्र को दिए वचनों के कारण दक्षिणा चुकाने की बात आती है तो सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र द्वारा काशी के बाजार में यही मातृरूपेण शैव्या को बेच दिया जाता है।
द्वापर युग में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी अर्जुन के द्वारा स्वयंवर में जीती गई द्रोपदी पांचों पांडवों की पत्नी बन कर अपना जीवन व्यतीत करती है। एक वस्तु की भांति स्त्री को पांच लोगो के बीच बाट दी जाती है.... बात यही ख़त्म नहीं हो जाती हैं, युधिष्ठिर द्रोपदी को जुए में दाव पर लगा कर हार जाते है।
 द्रुत क्रीड़ा भवन में दुहशासन के द्वारा द्रोपदी को घसीट कर लाया जाता है और भारी सभा में दुर्योधन द्रोपदी को नंगा करने का आदेश दे देते है। यह बात और है कि नअतिबिलंब वासुदेव ने आकर द्रोपदी की अस्मत बचा लिए।
     सोचने  वाली बात यह है कि नारी आदि शक्ति है और पूजनीय है , तो यह बात वहां मौजूद भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाार्य, कृपाचार्य, गांडीवधारी अर्जुन , दस हाथियों सा बलशाली भीम इन बातो को भूल कैसे गए। क्यों एक स्त्री , एक पुत्री के रक्षा का ख्याल नहीं आया ? एक से एक वीर धनुर्धर नत मस्तक होकर  एक अबला द्रौपदी की इज्जत भारी सभा में नीलाम होते देखते रहे।
 
एक तरफ जहां स्त्री को माता आदि कह कर पूजा अर्चना की जाती है, माता को भगवान का रूप कहा जाता है। वहीं दूसरी तरफ एक स्त्री को एक वस्तु और एक आज्ञाकारी दासी का रूप दिया गया है। यह कैसी विडंबना है।
                        इन तमाम परस्थितियों से जुड़े स्त्री जीवन पर गौर करे तो एक स्त्री और पुरुष के जीवन में ढेरों विषमताएं देखें को मिलती है ।
                                              स्त्री का जीवन तो एक मुसाफिर का जीवन है ,जो न तो उस स्थान को प्राप्त कर पाती है, जो उससे अपेक्षित है। ना ही उसे जीने की स्वतंत्रता होती है। ये बात भी है कि जीते जी अपने तमाम सुखो का त्याग कर देना पुरुषों द्वारा संभव नहीं। वाकई पीड़ादायक है स्त्री जीवन!
                         सर्वस्व समर्पण करने के बाद भी स्त्री एक त्रासित जीवन जीने को मजबूर हैं। सच तो यह है कि ' पुरुषों की सोच एकांगी है। वह कभी स्त्री जीवन को गहराई से परखने की चेष्ठा नहीं करता, और तब स्त्री मूकदर्शक बन कर जीने को मजबूर हो जाती हैं।'

 यह संसार तो चार दिनों का मेला है। स्त्री और पुरूष एक सिक्के के दो पहलू है। दोनों का महत्व समान है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं।
ऐसा नहीं की स्त्री को पुरुष से बेहतर होना चाहिए या पुरुषों को स्त्री से बेहतर होना चाहिए, परंतु सम्मान पाने का हर कोई अधिकारी है।
स्त्री मानव जाति का अभिन्न अंग है। इसके बिना संसार का आगे बढ़ना संभव नहीं।

 इन दिनों स्त्री को विशेष बनाने पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन स्त्री तो युगों से देवी की भांति पूजी गई है, परंतु इसका कल्याण नहीं हो पाया, इतिहास इसका साक्षी है। नारी जाति को विशेष क्यों बनाने पर जोर दिया जा रहा है , यह समझ से परे है। क्यों की कही न कही यह लिंग भेद को बढ़ावा दे रहा है । विशेष बनाने की चाह त्याग कर ' समान्य ' ही रहने दिया जाए, इसी में कल्याण है। सत्य क्या, असत्य क्या, इस सीमा से परे जाकर सोचे, क्यों कि जब नारी जाति का अपमान होता है तो मानव के सृष्टि के रचयिता का अपमान करता है। 

चलते चलते यही कहेंगे कि लिंग- भेद को बहुत ज्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। हम इंसान है; और हम इंसानों को बस इंसान की तरह देखने में सक्षम होना चाहिए।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता|
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः||
#iamsonuamit

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शनिवार, 23 मई 2020

रिश्तों के बदलते आयाम

i'msonuamit
सभ्य,अनुशासन, पराकाष्टा की सीमा में बंधा मानव समय के साथ अपनी गति मिला कर अपनी जीवन यात्रा शुरू करता है। इस यात्रा में कई पड़ाव आते है, कई राही मिलते है जो मन को पसंद आता है, दिल को अच्छा लगता है। वह जिसके साथ होता है, उसको साथ लेकर चलना चाहता है, उसके खुशी में खुश हो लेता है, उसके सुख से सुखी होता है, उसके विश्राम से थकावट भूल जाता है, उसकी चाह में अपनी चाह मिला देता है। उसकी तमन्ना , उसकी पसंद, इच्छा, अभिलाषा, सपना , भविष्य और वर्तमान सब सुख उसका अपना प्रिय हो जाता है।

परंतु 'दो राही' जो अब साथी बन जाते है, के बीच लगाव की स्थिरता वक़्त की साथ हिचकोले खाने लगता है। कहते है ' परस्पर विश्वास का परिणाम अटूट बंधन का आधार होता है '।  समय बड़ा बलवान है। जो जीवन को लक्षित मार्गो पर मनमाने ढंग से चलने नहीं देता। और समय के साथ रिश्तों के बीच खींचातानी शुरू हो जाता है। और आजमा लेता है वक़्त इसे भी। 
अब निर्भर करता है कि रिश्तों की बुनियाद कितनी गहरी और मजबूत है। 

जीवन कभी स्थिर नहीं रहता है परिवर्तन ही संसार का नियम है। रात है तो सवेरा होगा और सवेरा हुआ तो सांझ भी होगा। और ऐसी स्थिति भी आती है जब दिन और रात बराबर जो जाते है परन्तु यह भी सत्य है कि वह स्थिर नहीं रह सकता। जब रात गहरी कालिमा लिए होता है तो हाथ को हाथ नहीं दिखाई देता और तेज रोशनी में आंखे चौंधिया जाया करती है। 

चलते चलते मै तो यही कहूंगा कि, यदि बहुत परेशानी ना हो तो किसी भी रिश्तों को टूटने और जाया ना होने दे। क्या फर्क पड़ता है , पहला कदम स्नेह का आप ही बढा देंगे तो, जिन रिश्तों पर समय के साथ धूल जम गया है, अपने स्नेह से हटा दे। 
#iamsonuamit

रविवार, 10 मई 2020

जीवन : एक संग्राम

i'msonuamit
यह जीवन एक संग्राम है; भाग नहीं सकता कोई इस संग्राम से! लाख जतन कर कोई कितना भी योजना बनाए, करना वहीं पड़ता है जो परिस्थिति तय करती है। फिर यह कहावत चरितार्थ हो जाता है इंसान सोचता कुछ है और करता कुछ है । अब यह वहीं समझ सकता है जो जीवन संग्राम के चक्रव्यूह को एक-एक कर पार कर रहा है।
                  जीवन का बीते वक़्त का हर एक पन्ना पलट कर देखे तो विराम और आराम शून्य मिलता है।
कई अतरंगी सपने सजाए बैठे है आंखो में। अनगिनत ख्वाबों में! और उस सपनों को पूरा करने के लिए एक उच्च कोटि की योजना। अलग अलग उच्च कोटि का उद्देश्य पथ बनता है, कठोर तपस्या, वक़्त को मोड़ देने वाला परिश्रम होता है। पर करना वहीं पड़ता है आखिरकार, जो कालक्रम तय करता है। चले जाना पड़ता है, वक़्त जिस ओर उन्मुख करती है। कर्म स्वतंत्र होकर भी विधि के विधान से मुक्ति नहीं हो पाता है। 
सांसारिक जीवन ज्वार-भाटा से भरा सागर है जिसमें एक छोर पर कर्म और दूसरे छोर पर भाग्य की उत्ताल तरंगों के बीच अपने को स्थापित करने की कोशिश करता रहता है।

आपको मेरा ब्लॉग कैसा लगा जरूर बताएं।


शनिवार, 18 अप्रैल 2020

मित्रता : एक निबंध

i'msonuamit



छात्रावस्था में मित्रता की धन सवार रहती है। मित्रता हृदय से उमड़ पड़ती है। बाल मैत्री में जो मग्न करने बाला आनंद होता है,जो हृटय को बेधने वाली ईष्ष्यां और खिन्नता होती है, वह और कहाँ? कैसी मधुरता, कैसी अनुरक्ति तथा  कैसा अपार विश्वास होता है। वर्तमान कैसा आनंदमय दिखाई देता है और भविष्य के संबंध में कैसी लुभाने वाली कल्पनाएँ मन में रहती हैं किंतु जिस प्रकार युवा पुरुष की मित्रता स्कूल के बालक की मित्रता से दढ शांत और गंभीर होती है, उसी प्रकार हमारी युवावस्था के मित्र बाल्यावस्था के मित्रों से कई बातों में मिन्न होते हैं। सुंदर प्रतिभा, मनभावनी चाल और स्वच्छंद प्रकृति, ये ही दो-चार बातें देखकर मित्रता की जाती है, पर जीवन संग्राम में साथ देने वाले मित्रों में इनसे कुछ अधिक बातें होनी चाहिए। मित्र केवत उसे नहीं कहते, जिसके गुणों की तो हम प्रशंसा करें, पर जिससे हम स्नेह न कर सकें, जिससे अपने छोटे-छोटे काम तो हम निकालते जाएँ, पर भीतर ही भीतर घृणा करते हैं। मित्र सच्चे पथ-प्रदर्शक के समान होना चाहिए, जिस पर हम पूरा विश्वास कर सके।


मित्र भाई के समान होना चाहिए जिसे हम अपना प्रीति-पात्र बना सकें । हमारे और हमारे मित्र के बीच सच्ची सहानुभूति होनी चाहिए। ऐसी सहानुभूति जिससे एक के हानि-लाभ को दूसरा अपना हानि लाभ समझे। मित्रता के लिए यह आवश्यक नहीं कि दो मित्र एक ही प्रकार का कार्य करते हों। दो भिन्न प्रकृति के भनुष्यों में भी बराबर प्रीति और मित्रता रही है। श्रीराम धीर और शांत प्रकृति के थे, लक्ष्मण उग्र और उद्धत स्वभाव के, पर दोनों भाइयों में प्रगाढ़ प्रेम था। समाज में विभिन्नता देखकर लोग एक दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं । जो गुण हममें नहीं हैं, हम चाहते हैं कि कोई ऐसा मित्र मिले जिसमें वे गुण हों। चिंताशील मनुष्य प्रफुल्लित चित्त का साथ दूँढता है, निर्बल बली का, धीर उत्साही का उच्च आकांक्षा याला चंद्रगुप्त युक्ति और उपाय के लिए चाणक्य का मुँह ताकता या। नीति विशाद अकबर मन बहलाने के लिए बीरबल की ओर देखा करता था।


                                                                                                            मित्र का कत्त्तव्य इस प्रकार बताया गया है-"उच्च और महान कार्यों में इस प्रकार सहायता देना, मन बढ़ाना और साहस दिलाना कि तुम अपनी सामर्थ्य से बाहर काम कर जाओ ।" यह कुत्त्तव्य उसी से पूरा होगा जो दृढ़ चित्त और सत्य संकल्प का हो। इसीलिए हमें ऐसे मित्र की खोज में रहना चाजिए जिसमें हमसे अधिक आत्मबल हो। हमें उसका पल्ला उसी तरह पकड़ना चाहिए जिस तरह सुग्रीव ने राम का पल्ला पकड़ा था।


आजकल जान-पहचान बढ़ाना कोई बड़ी बात नहीं है। कोई भी युवा पुरुष ऐसे अनेक युवा पुरुषों को पा सकता है जो उसके साथ थियेटर देखने जाएँगे, नाच-रंग में जाएँगे, सैर-सपाटे में, भोजन का निमंत्रण स्वीकार करेंगे । ऐसे जान पहचान के लोगों से कुछ हानि न होगी तो लाभ भी न होगा। पर यदि हानि होगी तो बड़ी भारी होगी। यदि ये जान-पहचान के लोग उन मनचले युवकों में से निकलें जो अमीरी की बुराइयों और मूर्खताओं की नकल किया करते हैं, दिन-रात बनाव श्रृंगार में रहा करते हैं तो इनसे बढ़कर शोचनीय जीवन किसका होगा? हमें ऐसे प्राणियों का साथ नहीं करना चाहिए। कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है। यह केवल नीति और सद्वृत्ति का ही नाश नहीं करता बल्कि बुद्धि का क्षय भी करता है। किसी युवा पुरुष की संगति यदि बुरी होगी तो वह उसके पैरों में बंधी चक्की के समान होगी, जो उसे दिन-रात अवनति के गड़ढे में गिराती जाएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली भुजा के समान होगी जो उसे निरंतर उन्नति की ओर उठाते जाएगी।
नोट :- यह निबंध वर्ग 10 के लिए महत्वपूर्ण है ।


#iamsonuamit                 SONU AMIT






शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

'किसी भी Whats App मेसेज पर आँख बंद कर यकीन ना करे'

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बुद्धि या समझ का की लूट क्या होता हैं? यह ऐसे होता है- जैसे एक इंसान से उसके जीने की आज़ादी छिन ले, जैसे  कोई आपसे 'सोचने' की शक्ति छीन ले। आप वही सोचें, वैसा ही सोचें जैसा वो चाहते हैं। जैसे कि WhatsApp पर  कुछ देखा, पढ़ा, मान लिया और दूसरे को फोर्वोर्ड कर दिया बिना कुछ सोचे, बिना सच को ढूँढे। बिना अपनी अक़्ल का इस्तमाल किए।  आजकल हमारे देश में सोच सबसे बड़ी लूट हो रही है कई शिकार हैं, जो बचे हुए हैं । वो इसलिए क्योंकि वो समझदार और जागरुक हैं। उनके आस पास रहना और उनसे सीखना बहुत ज़रूरी है।
बस यही कहना चाहूंगा कि कोई मेसेज Forward करने से पहले जांच-रख ले, सही और गलत का पता कर ले । आप समझदार है। आपके और आपके समाज के लिए जो बेहतर है आप बख़ूबी समझते है । तो अपना और अपने लोगो का ख्याल रखे । कुछ भी पोस्ट लिखने से पहले और भेजने से पहले सोच-विचार कर ले। किसी भी WhatsApp मेसेज पर आँख बंद कर यकीन ना करे ।  

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गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

आधी-अधूरी

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एक कहानी जो आधी-अधूरी रह गई, पहुंच जाती अपने मुकाम तक, पर शुरुवात थोड़ी धीमी रह गई   
आंखो में उसके एक सवाल हमेशा से पाया था... उसकी खामोशी जैसे पूछती-बता कसूर किसका है। 
एक अबूझ पहेली लिए अब भी मन भटकता है।
आज तक वो खामोश निगाहें क्यों पीछा किया करती हैं...

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

शाम मुंडेर पर अटक सी जाती है

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इन दिनों 'वक़्त' पहाड़ जैसा हो गया है, सुबह होते ही रोज़ विशाल जल पर्वत सा खड़ा हो जाता है। दिन किसी तरह गुजर तो जाता है, पर शाम मुंडेर पर अटक सी जाती है। रात को ठंडी हवाएं रफ़ी के नगमों के संग कोई पुराना वाकया ढूंड लाता है, फिर मै बैठ कर शून्य में बुझे चांद को देख कर मुस्कुरा लिया करता हूं....... परेशान हो जाता हूं घर बैठ कर, पर उपर वाले को शुक्रिया भी कहने को दिल करता है....इस भागती जिंदगी में मन को सुलझाने का वक़्त मिल गया है !
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दोस्ती : एक उन्मुक्त रिश्ता

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जिंदगी में एक रिश्ता जो हम खुद चुनते है। खुद सवारते है, ये रिश्ता होता है दोस्ती का। हर रिश्ते में अपेक्षाए होती है और समय समय पर जरूरी भी है, लेकिन हर समय अपेक्षा करते रहना अपको अपने दोस्तो से दूर ले जाती है। ऐसा जरूरी नहीं है कि अपका दोस्त हर वक़्त अपके लिए उपलब्ध हो। सभी की अपनी जरूरत है, अपनी व्यस्तताए होती हैं। अगर अपका दोस्त ज्यदा व्यस्त है तो इसका मतलब ये नहीं कि वो जानबूझकर ऐसा कर  रहा है। समय के साथ सभी की प्राथमिकताएं बदलती हैं, कभी पढ़ाई, तो कभी एग्जाम तो कभी कुछ और चीज की जिम्मदारियां। ऐसे में जब आप बुलाएं तब वो वहां मौजूद हो ऐसा जरूरी नहीं होता। आप समझदार लोगो में से है तो आप की इस रिश्तों में समझदारी दिखाएं। मै ये नहीं कहता कि आप ही इस  चीज को हमेशा  समझे लेकिन दोस्त भी तो अपके हैं, और उसको आपकी जरूरत है। दोस्ती में कोई बड़ा या छोटा नहीं होता।

रूठना

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‘रूठने’  का मतलब गुस्सा करना कतई नही होता है और ना ही ‘ईर्ष्या’ करना
‘रूठना’ बस रूठ जाना है
किसी भी बात के लिए- ऐसे ही कि जैसे एक छोटी बच्ची एक चाभी वाली गुड़िया के लिए रूठ जाती है,
  रूठना न तो जिद पर अड़ना है ।
ना ही किसी चीज को पा लेने का तरीका है ..
ना दुराव है , ना मनुहार है – रूठना
बस एक शब्द है -रूठना-
जो कभी भी कहा नही जाता है,
दरअसल मान जाने की एक पड़ाव है –रूठना–
किसी के बातों को मान जाने के, हाँ करने की पहली झिझक है – रूठना -
किसी का रूठ जाना हो जाता है लाज़मी
जब गुस्से का सारा कढ़वापन छलकता है बाहर

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