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सोमवार, 17 अगस्त 2020

मेरे सच्चाई की कहानी

i'msonuamit


मै सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र जैसा तो नहीं, लेकिन सत्यवादी बनने का जरूर प्रयत्न करता रहा हूं। जब की आप अपने चारों तरफ़ नजर घुमाएंगे तो सिर्फ झूठ का बोल बाला है, पाएंगे। सच- झूठ का अपने में इस कदर भाईचारा हो गया है कि पता ही नहीं चलता है कि सच कौन और झूठ कौन !

अब यह कह दिया जाए की शुद्ध सच का लोप हो गया है संसार से , तो ठहर जाइए ऐसा नहीं है । वर्तमान की स्थिति यह है की किसी की बातों में यदि सच का प्रतिशत अधिक होता है तो कम सच प्रतिशत के सामने उसे शुद्ध सच ही कहा जाता है। एक आदर्श कथन हमारे महान देश का ' सत्यमेव जयते' शोभा की वस्तु प्रतीत होता है। हालांकि किन किन लोगो के आचरण में शामिल है आप ही निर्णय कर लीजिए ना । इन दिनों मैं सच बोलने का भरसक प्रयत्न किया करता हूं।  14 साल का था मै, ठीक ठीक याद है की बहुत असमंजस वाली स्थिति से गुजरा था, मतलब झूठ बोले तो पकड़े जाने पर पिटाई होती थी । और यदि सच बोला तो झूठ बोलने से जायदा कुटाई होती थी। मतलब करे तो करे क्या? तब हमारे गणित के गुरु जी ( नाम क्या लेना ), ने रास्ता दिखाया कि " यदि जरूरत ना हो तो झूठ नहीं बोलना है " और इन्हीं तथ्यो के आधार पर दावा कर सकता हूं की जो भी अच्छा खराब बोला हूं उसमे निश्चित सच का प्रतिशत अधिक रहा होगा । किसी व्यक्ति में अच्छाई और बुराई में जिसका पलरा भारी होता है उसी के कारण वह जाना जाता है। अब ना तो कोई सत प्रतिशत सच्चा होता है और ना ही सत प्रतिशत झूठा होता है, तो इसी आधार पर मै खुद को सत्यवादी मानता रहा हूं। 

हालांकि सत्यवादी होने का प्रमाण आपको मेरे दोस्तो से भी मिल सकता है। वो कहते है ना कि हर एक दोस्त कमीना होता है, लेकिन मेरे लिए मेरे लिए मेरा कोई दोस्त कमीना नहीं है।

वो दिन बाकी दिनों के जैसे बिल्कुल नहीं था जब मुझे मेरे स्कूल के गुरुजी छड़ी से खदेड़ते हुए स्कूल ले गए थे, बस मुझे यही दिन याद है बांकी इसके ठीक एक दिन पहले और बाद की घटना मुझे जरा भी याद नहीं। अपने बराबर के परिचित लड़कों के बीच ही बैठाया गया था। सब के सब छठे हुए शरारती थे। गुरु जी आए और जादूगर के समान हवा में छड़ी घुमा कर बोले " सदा सच बोलो " मैंने तो बस कसम खा ली क्यों की वजह भी थी कसम खाने की पूरी रास्ते गुरु जी स्कूल कूटते हुए लाए थे। हमको लगा यही महलम है। वैसे भी अपना क्या ही जाता है , सब कहते है तो लो सच ही बोलेंगे और सच के सिवा कुछ नहीं बोलेंगे।

कुछ दिन बाद मुझे क्रिकेट के कीड़े से काट लिया। क्लास छोड़ कर चला गया । दूसरे दिन पुछने पर गुरु जी को सारा वाकया सुना दिया। आगे की कहानी बताने की जरूरत ही क्या है, आप खुद समझ जाओ गुरु जी क्या किए होंगे। मेरे सहपाठी जो अब दोस्त बन गए थे, ने मेरे हसी उड़ाई , सबने कहा झूठ ही बोल देते देते। इस स्थिती में बहाने ही काम आते है। एक और सीख मिल चुका था। यह तो बिल्कुल नया सा ज्ञान था, खैर मैंने ग्रहण कर लिया।

हालांकि मैंने दूसरा रास्ता भी अपनाया था, वहीं बहाना वाला , लेकिन वो भी काम नहीं आया।आलम यह रहा कि सच का प्रतिशत जायदा रहा और कुटाई का प्रतिशत भी । झूठ बोलना भी एक कला है। हर किसी के बस की बात नहीं है श्रीमान।

लेकिन थोड़ा चालक जरूर हो गया था, फिर भी सफेद झूठ बोलने कभी नहीं आ पाया। बस मुहावरों के कॉलम में याद किया कि सफेद झूठ मतलब सारा - सर झूठ।

मतलब अब सच्चाई का प्रमाण कसम खाने से सिद्ध करने लगा था। मतलब कोई बात यदि सामने वालों को भ्रामक लगे तो कसम खाओ। जैसे विद्या कसम, और कोई भी प्रिय वस्तु या व्यक्ति का कसम। कसम खाने की अंदाज़ कुछ ऐसा होता था कि कसम खा कर न्यूटन के सिद्धांतों को भी झुठलाया जा सकता था।

हर रोज एक नई कसम , टुकड़े टुकड़े के कसम खाते चेहरे पर मूंछें आने लगी थी। उस समय तक यदि सच का प्रतिशत निकाला जाता तो 17 साल के उम्र तक सच्चाई के प्रितिशत से पाचवी तो जरूर पास हो सकता था।

मेरे कान भी गवाह है, बहुत खींचे गए हैं सच बोलने पर, लेकिन उसने कभी शिक़ायत नहीं किया।

कभी कभी ऐसे परिस्थिती से सामना हुआ की सच बोलने से थकावट सी होने लगी थी। आख़िर अकेला मै ही कब तक सच बोलता रहूंगा। जैसे पूरे तलाब में एक ही साफ मछली है।

मेरा ऐसा मानना शुरू से नहीं रहा हैं , कुछ खास परिस्थिती के कारण शायद । आख़िरकार झूठ और सच के चक्की के बीच मैंने खुद की हितो की रक्षा करना भी सीख गया।

मैंने गणित वाले गुरुजी की सीख को अपने जीवन में उतर लिया । और अब 24 साल का एक बड़ा सा जीवन जी चुका हूं और अब सच का प्रतिशत दसवीं कक्षा पास करवाने के लायक हो गया है।

मैंने अपने मासूम से चेहरे के साथ सत्य बोलने वाले व्यक्ति का वो मुकाम हासिल कर लिया है कि जिसके पीछे तो कुछ - कुछ झूठ भी सच ही होते है । वो भी बिना शक किए। लेकिन एक मै ऐसा दावा कर सकता हूं कि झूठ और सच के बीच जीवन जीना एक कला है और इस कला को सीखने में मेरे दोस्तों ने भी पसीने धन्वामै सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र जैसा तो नहीं, लेकिन सत्यवादी बनने का जरूर  प्रयत्न करता रहा हूं। जब की आप अपने चारों तरफ़ नजर घुमाएंगे तो सिर्फ झूठ का बोल बाला है,  पाएंगे। सच- झूठ का अपने में इस कदर भाईचारा हो गया है कि पता ही नहीं चलता है कि सच कौन और झूठ कौन !

अब यह कह दिया जाए की शुद्ध सच का लोप हो गया है संसार से , तो ठहर जाइए ऐसा नहीं है । वर्तमान की स्थिति यह है की किसी की बातों में यदि सच का प्रतिशत अधिक होता है तो कम सच प्रतिशत के सामने  उसे शुद्ध सच ही कहा जाता है। एक आदर्श कथन हमारे महान देश का  ' सत्यमेव जयते ' शोभा की वस्तु प्रतीत होता है। हालांकि किन किन लोगो के आचरण में शामिल है आप ही निर्णय कर लीजिए।  मै भी आज की दिनों ने सच बोलने का भरसक प्रयत्न किया करता हूं। हालांकि मै 14 साल का था, ठीक ठीक याद है मुझे बहुत असमंजस वाली स्थिति से गुजरा था, मतलब झूठ बोले तो पकड़े जाने पर पिटाई होती थी । और यदि सच बोला तो झूठ बोलने से जायदा कुटाई होती थी। मतलब करे तो करे क्या? तब हमारे गणित के गुरु जी ( नाम क्या लेना ), ने रास्ता दिखाया कि " यदि जरूरत ना हो तो झूठ नहीं बोलना है " और इन्हीं तथ्यो के आधार पर दावा कर सकता हूं की  जो भी अच्छा खराब बोला हूं उसमे निश्चित सच का प्रतिशत अधिक रहा होगा । किसी व्यक्ति में अच्छाई और बुराई में जिसका पलरा भारी होता है उसी के कारण  वह जाना जाता है।  अब ना तो कोई सत प्रतिशत सच्चा होता है और ना ही सत प्रतिशत झूठा होता है, तो इसी आधार पर मै खुद को सत्यवादी मानता रहा हूं। 

हालांकि सत्यवादी होने का प्रमाण आपको मेरे दोस्तो से भी मिल सकता है। वो कहते है ना कि हर एक दोस्त कमीना होता है, लेकिन मेरे लिए मेरे लिए मेरा कोई दोस्त कमीना नहीं है।

वो दिन जब मुझे मेरे स्कूल के गुरुजी छड़ी से खदेड़ते हुए स्कूल ले गए थे, बस मुझे यही दिन याद है बांकी इसके ठीक एक दिन पहले और बाद की घटना मुझे जरा भी याद नहीं। अपने बराबर के परिचित लड़कों के बीच ही बैठाया गया था। सब के सब छठे हुए शरारती थे। गुरु जी आए और जादूगर के समान हवा में छड़ी घुमा कर बोले " सदा सच बोलो " मैंने तो बस कसम खा ली क्यों की वजह भी थी कसम खाने की पूरी रास्ते गुरु जी स्कूल कूटते हुए लाए थे। हमको लगा यही महलम है। वैसे भी अपना क्या ही जाता है , सब कहते है तो लो सच ही बोलेंगे और सच के सिवा कुछ नहीं बोलेंगे।

कुछ दिन बाद मुझे क्रिकेट के कीड़े से काट लिया। क्लास छोड़ कर चला गया । दूसरे दिन पुछने पर गुरु जी को सारा वाकया सुना दिया। आगे की कहानी बताने की जरूरत ही क्या है, आप खुद समझ जाओ गुरु जी क्या किए होंगे। मेरे सहपाठी जो अब दोस्त बन गए थे, ने मेरे हसी उड़ाई , सबने कहा झूठ ही बोल देते देते। इस स्थिती में बहाने ही काम आते है। एक और सीख मिल चुका था। यह तो बिल्कुल नया सा ज्ञान था, खैर मैंने ग्रहण कर लिया।

हालांकि मैंने दूसरा रास्ता भी अपनाया था, वहीं बहाना वाला , लेकिन वो भी काम नहीं आया।

आलम यह रहा कि सच का प्रतिशत जायदा रहा और कुटाई का प्रतिशत भी । झूठ बोलना भी एक कला है। हर किसी के बस की बात नहीं है श्रीमान।

लेकिन थोड़ा चालक जरूर हो गया था, फिर भी सफेद झूठ बोलने कभी नहीं आ पाया। बस मुहावरों के कॉलम में याद किया कि सफेद झूठ मतलब सारा - सर झूठ।

मतलब अब सच्चाई का प्रमाण कसम खाने से सिद्ध करने लगा था। मतलब कोई बात यदि सामने वालों को भ्रामक लगे तो कसम खाओ। जैसे विद्या कसम, और कोई भी प्रिय वस्तु या व्यक्ति का कसम।  कसम खाने की अंदाज़ कुछ ऐसा होता था कि कसम खा कर न्यूटन के सिद्धांतों को भी झुठलाया जा सकता था।

हर रोज एक नई कसम , टुकड़े टुकड़े के कसम खाते चेहरे पर मूंछें आने लगी थी। उस समय तक यदि सच का प्रतिशत निकाला जाता तो 17 साल  के उम्र तक सच्चाई के प्रितिशत से  पाचवी तो जरूर पास हो सकता था।

मेरे कान भी गवाह है, बहुत खींचे गए हैं सच  बोलने पर, लेकिन कभी शिक़ायत नहीं किए।

कभी कभी ऐसे परिस्थिती से सामना हुआ  की सच बोलने से थकावट सी होने लगी थी। आख़िर अकेला मै ही कब तक सच बोलता रहूंगा। जैसे पूरे तलाब में एक ही साफ मछली है।मेरा ऐसा मानना शुरू से नहीं रहा हैं , कुछ खास परिस्थिती के कारण शायद । आख़िरकार झूठ और सच के चक्की के बीच मैंने खुद की हितो की रक्षा करना भी सीख लिया।

मैंने गणित वाले गुरुजी की सीख को अपने जीवन में उतर लिया । और अब 24 साल का एक बड़ा सा जीवन जी चुका हूं और अब  सच का प्रतिशत दसवीं कक्षा पास करवाने के लायक हो गया है।

मैंने अपने मासूम से चेहरे के साथ सत्य बोलने वाले व्यक्तित्व का वो मुकाम हासिल कर लिया है कि जिसके पीछे तो कुछ - कुछ झूठ  भी सच ही होते है । वो भी बिना शक किए। लेकिन एक मै ऐसा दावा कर सकता हूं कि झूठ और सच के बीच जीवन जीना एक कला है और इस कला को सीखने में मेरे दोस्तों ने भी खूब मदद किए । धन्यवाद् ।

आपको मेरा पोस्ट कैसा लगा, कमेंट करके जरूर बताएं। 


गुरुवार, 4 जून 2020

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता.....

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सर्वभूतेषु, मातृरूपेण, शक्तिरूपेण, श्रद्धारूपेण  संस्थिता

सर्वभूतेषु, मातृरूपेण, शक्तिरूपेण, श्रद्धारूपेण संस्थिता कहकर स्त्री की वंदना आदि काल से की जाती रही है।
परन्तु जब विश्वामित्र को दिए वचनों के कारण दक्षिणा चुकाने की बात आती है तो सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र द्वारा काशी के बाजार में यही मातृरूपेण शैव्या को बेच दिया जाता है।
द्वापर युग में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी अर्जुन के द्वारा स्वयंवर में जीती गई द्रोपदी पांचों पांडवों की पत्नी बन कर अपना जीवन व्यतीत करती है। एक वस्तु की भांति स्त्री को पांच लोगो के बीच बाट दी जाती है.... बात यही ख़त्म नहीं हो जाती हैं, युधिष्ठिर द्रोपदी को जुए में दाव पर लगा कर हार जाते है।
 द्रुत क्रीड़ा भवन में दुहशासन के द्वारा द्रोपदी को घसीट कर लाया जाता है और भारी सभा में दुर्योधन द्रोपदी को नंगा करने का आदेश दे देते है। यह बात और है कि नअतिबिलंब वासुदेव ने आकर द्रोपदी की अस्मत बचा लिए।
     सोचने  वाली बात यह है कि नारी आदि शक्ति है और पूजनीय है , तो यह बात वहां मौजूद भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाार्य, कृपाचार्य, गांडीवधारी अर्जुन , दस हाथियों सा बलशाली भीम इन बातो को भूल कैसे गए। क्यों एक स्त्री , एक पुत्री के रक्षा का ख्याल नहीं आया ? एक से एक वीर धनुर्धर नत मस्तक होकर  एक अबला द्रौपदी की इज्जत भारी सभा में नीलाम होते देखते रहे।
 
एक तरफ जहां स्त्री को माता आदि कह कर पूजा अर्चना की जाती है, माता को भगवान का रूप कहा जाता है। वहीं दूसरी तरफ एक स्त्री को एक वस्तु और एक आज्ञाकारी दासी का रूप दिया गया है। यह कैसी विडंबना है।
                        इन तमाम परस्थितियों से जुड़े स्त्री जीवन पर गौर करे तो एक स्त्री और पुरुष के जीवन में ढेरों विषमताएं देखें को मिलती है ।
                                              स्त्री का जीवन तो एक मुसाफिर का जीवन है ,जो न तो उस स्थान को प्राप्त कर पाती है, जो उससे अपेक्षित है। ना ही उसे जीने की स्वतंत्रता होती है। ये बात भी है कि जीते जी अपने तमाम सुखो का त्याग कर देना पुरुषों द्वारा संभव नहीं। वाकई पीड़ादायक है स्त्री जीवन!
                         सर्वस्व समर्पण करने के बाद भी स्त्री एक त्रासित जीवन जीने को मजबूर हैं। सच तो यह है कि ' पुरुषों की सोच एकांगी है। वह कभी स्त्री जीवन को गहराई से परखने की चेष्ठा नहीं करता, और तब स्त्री मूकदर्शक बन कर जीने को मजबूर हो जाती हैं।'

 यह संसार तो चार दिनों का मेला है। स्त्री और पुरूष एक सिक्के के दो पहलू है। दोनों का महत्व समान है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं।
ऐसा नहीं की स्त्री को पुरुष से बेहतर होना चाहिए या पुरुषों को स्त्री से बेहतर होना चाहिए, परंतु सम्मान पाने का हर कोई अधिकारी है।
स्त्री मानव जाति का अभिन्न अंग है। इसके बिना संसार का आगे बढ़ना संभव नहीं।

 इन दिनों स्त्री को विशेष बनाने पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन स्त्री तो युगों से देवी की भांति पूजी गई है, परंतु इसका कल्याण नहीं हो पाया, इतिहास इसका साक्षी है। नारी जाति को विशेष क्यों बनाने पर जोर दिया जा रहा है , यह समझ से परे है। क्यों की कही न कही यह लिंग भेद को बढ़ावा दे रहा है । विशेष बनाने की चाह त्याग कर ' समान्य ' ही रहने दिया जाए, इसी में कल्याण है। सत्य क्या, असत्य क्या, इस सीमा से परे जाकर सोचे, क्यों कि जब नारी जाति का अपमान होता है तो मानव के सृष्टि के रचयिता का अपमान करता है। 

चलते चलते यही कहेंगे कि लिंग- भेद को बहुत ज्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। हम इंसान है; और हम इंसानों को बस इंसान की तरह देखने में सक्षम होना चाहिए।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता|
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः||
#iamsonuamit

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शनिवार, 23 मई 2020

रिश्तों के बदलते आयाम

i'msonuamit
सभ्य,अनुशासन, पराकाष्टा की सीमा में बंधा मानव समय के साथ अपनी गति मिला कर अपनी जीवन यात्रा शुरू करता है। इस यात्रा में कई पड़ाव आते है, कई राही मिलते है जो मन को पसंद आता है, दिल को अच्छा लगता है। वह जिसके साथ होता है, उसको साथ लेकर चलना चाहता है, उसके खुशी में खुश हो लेता है, उसके सुख से सुखी होता है, उसके विश्राम से थकावट भूल जाता है, उसकी चाह में अपनी चाह मिला देता है। उसकी तमन्ना , उसकी पसंद, इच्छा, अभिलाषा, सपना , भविष्य और वर्तमान सब सुख उसका अपना प्रिय हो जाता है।

परंतु 'दो राही' जो अब साथी बन जाते है, के बीच लगाव की स्थिरता वक़्त की साथ हिचकोले खाने लगता है। कहते है ' परस्पर विश्वास का परिणाम अटूट बंधन का आधार होता है '।  समय बड़ा बलवान है। जो जीवन को लक्षित मार्गो पर मनमाने ढंग से चलने नहीं देता। और समय के साथ रिश्तों के बीच खींचातानी शुरू हो जाता है। और आजमा लेता है वक़्त इसे भी। 
अब निर्भर करता है कि रिश्तों की बुनियाद कितनी गहरी और मजबूत है। 

जीवन कभी स्थिर नहीं रहता है परिवर्तन ही संसार का नियम है। रात है तो सवेरा होगा और सवेरा हुआ तो सांझ भी होगा। और ऐसी स्थिति भी आती है जब दिन और रात बराबर जो जाते है परन्तु यह भी सत्य है कि वह स्थिर नहीं रह सकता। जब रात गहरी कालिमा लिए होता है तो हाथ को हाथ नहीं दिखाई देता और तेज रोशनी में आंखे चौंधिया जाया करती है। 

चलते चलते मै तो यही कहूंगा कि, यदि बहुत परेशानी ना हो तो किसी भी रिश्तों को टूटने और जाया ना होने दे। क्या फर्क पड़ता है , पहला कदम स्नेह का आप ही बढा देंगे तो, जिन रिश्तों पर समय के साथ धूल जम गया है, अपने स्नेह से हटा दे। 
#iamsonuamit

रविवार, 10 मई 2020

जीवन : एक संग्राम

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यह जीवन एक संग्राम है; भाग नहीं सकता कोई इस संग्राम से! लाख जतन कर कोई कितना भी योजना बनाए, करना वहीं पड़ता है जो परिस्थिति तय करती है। फिर यह कहावत चरितार्थ हो जाता है इंसान सोचता कुछ है और करता कुछ है । अब यह वहीं समझ सकता है जो जीवन संग्राम के चक्रव्यूह को एक-एक कर पार कर रहा है।
                  जीवन का बीते वक़्त का हर एक पन्ना पलट कर देखे तो विराम और आराम शून्य मिलता है।
कई अतरंगी सपने सजाए बैठे है आंखो में। अनगिनत ख्वाबों में! और उस सपनों को पूरा करने के लिए एक उच्च कोटि की योजना। अलग अलग उच्च कोटि का उद्देश्य पथ बनता है, कठोर तपस्या, वक़्त को मोड़ देने वाला परिश्रम होता है। पर करना वहीं पड़ता है आखिरकार, जो कालक्रम तय करता है। चले जाना पड़ता है, वक़्त जिस ओर उन्मुख करती है। कर्म स्वतंत्र होकर भी विधि के विधान से मुक्ति नहीं हो पाता है। 
सांसारिक जीवन ज्वार-भाटा से भरा सागर है जिसमें एक छोर पर कर्म और दूसरे छोर पर भाग्य की उत्ताल तरंगों के बीच अपने को स्थापित करने की कोशिश करता रहता है।

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बुधवार, 15 अप्रैल 2020

शाम मुंडेर पर अटक सी जाती है

i'msonuamit

इन दिनों 'वक़्त' पहाड़ जैसा हो गया है, सुबह होते ही रोज़ विशाल जल पर्वत सा खड़ा हो जाता है। दिन किसी तरह गुजर तो जाता है, पर शाम मुंडेर पर अटक सी जाती है। रात को ठंडी हवाएं रफ़ी के नगमों के संग कोई पुराना वाकया ढूंड लाता है, फिर मै बैठ कर शून्य में बुझे चांद को देख कर मुस्कुरा लिया करता हूं....... परेशान हो जाता हूं घर बैठ कर, पर उपर वाले को शुक्रिया भी कहने को दिल करता है....इस भागती जिंदगी में मन को सुलझाने का वक़्त मिल गया है !
#iamsonuamit